रिपोर्ट: मोना कुमावत
स्थान: जोबनेर

राजस्थान की ऐतिहासिक जल धरोहरों में शामिल कालख बांध आज अपनी बदहाली की दर्दनाक कहानी बयां कर रहा है। कभी हजारों किसानों की सिंचाई, पशुओं के लिए पानी और भूजल स्तर का प्रमुख स्रोत रहा यह करीब 600 वर्ष पुराना बांध आज गाद, गंदे पानी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।

कभी क्षेत्र की जीवनरेखा था कालख बांध

जोबनेर क्षेत्र के पहाड़ों की गोद में स्थित कालख बांध का निर्माण लगभग 600 वर्ष पूर्व कालख ठिकाने के जागीरदार ठाकुर बेरीसाल सिंह ने कराया था। यह बांध उस दौर की उत्कृष्ट जल प्रबंधन व्यवस्था का प्रतीक माना जाता था। वर्षा का पानी यहां संग्रहित होकर पूरे वर्ष आसपास के गांवों की खेती, पशुपालन और पेयजल की जरूरतों को पूरा करता था।

स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 1981 तक यह बांध हर साल पूरी क्षमता से भर जाता था। बरसात के मौसम में यहां दूर-दूर तक केवल पानी ही दिखाई देता था और क्षेत्र का भूजल स्तर भी बेहतर बना रहता था।

उपेक्षा और अतिक्रमण ने बदली तस्वीर

समय के साथ बांध के जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण बढ़ता गया। प्राकृतिक जलमार्ग अवरुद्ध हो गए और वर्षों तक गाद निकासी व रखरखाव नहीं होने से बांध की जलधारण क्षमता लगातार घटती चली गई।

आज स्थिति यह है कि स्वच्छ जल से भरा रहने वाला यह ऐतिहासिक बांध गंदे पानी, झाड़ियों और गाद से पट चुका है। जल संरक्षण की इस धरोहर की ओर लंबे समय से प्रभावी ध्यान नहीं दिया गया।

पुनर्जीवन की है पूरी संभावना

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि जलग्रहण क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कर वैज्ञानिक तरीके से गहरीकरण, गाद निकासी और प्राकृतिक जल प्रवाह को बहाल किया जाए, तो कालख बांध एक बार फिर क्षेत्र के लिए वरदान साबित हो सकता है।

इससे न केवल भूजल स्तर में सुधार होगा, बल्कि किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होगा और वर्षा जल संचयन को भी नई मजबूती मिलेगी।

सरकार से संरक्षण की मांग

एक ओर सरकारें जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, वहीं सदियों पुरानी यह ऐतिहासिक जल संरचना पुनर्जीवन की राह देख रही है। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन और सरकार से कालख बांध के संरक्षण और पुनर्विकास के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।

भविष्य के लिए चेतावनी

कालख बांध केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध जल विरासत, किसानों की उम्मीद और आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो भविष्य में यह बांध केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित होकर रह जाएगा।